Monday, 3 June 2019

बड़ा अच्छा लगता है…


बड़ा अच्छा लगता है

बड़ा अच्छा लगता है……
याद करना उस लम्हे को,देखा था इन नज़रों ने जब तुम्हें पहली बार,
याद करना बड़ा अच्छा लगता है……
झूलती वो एक ट ज़ुल्फों की,तुम्हारे चेहरे पर क्या करूँ भुलाए नहीं भूलती,
याद करना बड़ा अच्छा लगता है……
उस पल ठहर गयी थी ज़िंदगी,जब आँखों से आँखें मिली थी पहली बार,
सब झूठे,बस वही इक पल था,जो सच्चा लगता है,यही कुछ है जो बड़ा अच्छा लगता है,
जब मिले थे पहली बार,उन मुलाकातों, और बातों-बातों में किया इजहार
याद करना,बड़ा अच्छा लगता है......
बदले दिन,महीने और साल,हर मौसम और हालात,पर तुम वही थे सच्चे जैसे हम मिले थे पहली बार.....
याद करना बड़ा अच्छा लगता है……
वो उड़ता तुम्हारा दुपट्टा,हवा के झोंको में,सरसराहट सी पैदा करता है,
खिचा सा चला आता हूँ,ये एहसास
 याद करना बड़ा अच्छा लगता है……
वो whatsapp,instagram की chat पर घंटों बातें करना,कहना कुछ अपनी,पर बहुत सी तुम्हारी सुनना,
याद करना बड़ा अच्छा लगता है……
अकड़ के रहने वाला ये दिल,तुम पर आकर पिघलेगा, सोचा, जाना था,
पर आया है सिर्फ तुम पर,बना सिर्फ तुम्हारा,ये इकरार करना,
याद करना बड़ा अच्छा लगता है……
मुकम्मल होगा या नही ये जानता नही ,किस्मत पर ज़िंदगी का चक्का चलता है,
पर हाँ कुबूल है ये बिना किसी शक-शुबा के,इजहार के साथ इकरार करना,
बड़ा अच्छा लगता है.............
याद करना उस लम्हे को,देखा था इन नज़रों ने जब तुम्हें  पहली बार,
याद करना बड़ा अच्छा लगता है……

Thursday, 11 April 2019

"चुनावी पंडित"


"चुनावी पंडित"
"चुनाव" लोकतन्त्र का 'पर्व' या यूं कहूँ “महापर्व” कहलाता है,हर नेता,हर दल अपने द्वारा किए गए कार्यों या किए जा सकने वाले कार्यों की गिनती जनता के सामने रखता है,सत्ताधारी और विपक्षी दल एक दूसरे की गलतियों की प्रदर्शनी बड़चड़कर प्रदर्शित करते हैं,टीका टिप्पड़ीयों का दौर शुरू हो गया है,साहब हो भी क्यों न “चुनाव का मौसम” जो आ गया है। किसी के वादों की पोल खुल रही,तो किसी के इरादों की,कहीं भी किसी भी दल के नेता के साथ कुछ भी हो जाये तो एक विश्व ख्यातिप्राप्त अस्त्र का प्रयोग तुरंत उनके द्वारा किया जाने लगता है,की “बदले की कार्यवाही है” या “विपक्षी दल की साजिश है”। समझ नही आता कभी-कभी की क्या ये नेता कभी कोई अपराध करते ही नहीं ? क्या ये घोटाले,घपले,आय से अधिक संपत्ति के मामले अपने आप धरती की गोद से निकल आते है,की इन्हे कोई अपने ऊपर लेने या गोद लेने की जिम्मेवारी ही नही समझता? हंसी आती है सोचकर,खैर इन सब बातों का तो नहीं पता पर इन मौसमों में एक चीज देखने मिल रही कि चुनाव के मौसम में "चुनाव के विशेषज्ञ पंडित" भी अवतरित होते है,जो जीत दिलाने की गारंटी देते हैं इसी बात को सुनकर हमारे शहर के नेताओं ने ऐसे पंडितों के घर दस्तक दी और कहा,महाराज कुछ ऐसा पूजन-पाठ शुरू करिए की इस चुनाव हमारी जीत पक्की हो जाए साथ ही बिपक्षी दल की जमानत जब्त हो जाए,मतलब उन्होने combo pack की मांग की। सभी नेताओं के लिए चुनावी पंडितों की सेना “यज्ञ पूजन-पाठ” में लग गए किसी पंडित की सलाह पर कोई नेताजी किसी ईश्वर को सेट करने लगे,किसी ने किसी और के दर का दरवाजा खटखटाया यज्ञ जाप माथा टेकना शुरू कर दिया गया है,सभी किसी न किसी ईश्वर के सहारे चुनाव की नइयाँ पार लगाने में जुट गए,जिन्होने कभी खुद को इस लोकतन्त्र में ईश्वर समान माना वो सिर्फ चुनावी मौसम में असली ईश्वर की शरण में जाते है।
हमने तो सुना था,कि लोकतन्त्र में असली चाबी या ईश्वर,तो जनता और मतदाता होते है,जो किसी भी दल या नेता की जीत या हार का फैसला उनके द्वारा किए गए कार्यों के आधार पर अपने मताधिकार का प्रयोग करके करते हैं।  पर शायद ही इन्हे कोई इतनी तब्बज्जो देता है,सिर्फ चुनावी मौसम में कभी मतदाता की याद आती है,ज़्यादातर तो इनकी अनदेखी ही होती है,अभी कुछ दिन पहले कहीं व्यंग पड़ा था,कि चुनाव दो चरणों में होते है,प्रथम चरण में नेता जी जनता के चरणों में और दूसरे में जनता नेताजी के चरणों में होती है।
कभी-कभी लगता है,कि अगर जनता रूपी ईश्वर को यदि वास्तव में सर्वोपरि रखा जाये और 'नेता' या 'जन प्रतिनिधि' वाकई जनता के प्रतिनिधि की परिभाषा के अनूसार कार्य करें,तो कभी किसी नेता को चुनाव जीतने के लिए मंत्र जप का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं,जनता के हितों से जुड़े कर्म का सहारा ही काफी होगा उनके लिए। पर शायद चुनावी पंडित लोकतन्त्र के पर्व में जनता से ज्यादा एहम किरदार रखते हैं,जो किसी भी नेता का भविष्य संवार या बिगाड़ सकते हैं जनता के मत नहीं। पर चुनाव में सारे पत्ते जनता जनार्दन के "मत" के प्रयोग में है,वो जैसा चाहे ऊट करवट लेगा,आप भी अपने "मताधिकार" का उपयोग या कहना चाहूँगा सदउपयोग जरूर करिएगा। वोट जरूर करिएगा और महापर्व के रंग देखिये बहुत देखने मिलेंगे। 

Tuesday, 9 April 2019

प्रश्न तो है???

प्रश्न तो है???

कल मैंने जो देखा वो नज़ारा शायद कई सालों के बाद इन आँखों के सामने आया,जिसे देखकर लगा कि ऐसा कुछ भी इस जीवन में अब भी हो रहा या होता है,ये भरोसा-सा खत्म होने लगा था। क्योंकि आज जो कई सालों से अपने आसपास घटित होता देख रहा हूँ,उससे एक बात तो लगने लगी है,कि शायद यही सही है,या यही होता है, और कुछ नहीं। जिस नज़ारे की बात मैं कर रहा हूँ,वो मैंने अपनी यात्रा के दौरान देखा,कल इन आँखों ने दो नन्हें भाइयों को एक हैंडपंप पर नहाते देखा,दोनों आपस में अठखेलियाँ कर रहे थे,दोनों कि उम्र कुछ ज्यादा नही थी,छोटा भाई हक़ के साथ अपने बड़े भाई को परेशान कर रहा था,कभी पानी उस पर डालता तो कभी बाल्टी को गिरा देता,बड़ा भाई जो उससे शायद ज्यादा बड़ा नहीं लग रहा था,उसकी हर शैतानी को खेल समझकर हंस रहा था,बड़ा भाई पानी के मग भर-भर कर अपने छोटे भाई के ऊपर डालकर उसे नहला रहा था और छोटा भाई भी मज़े से खेल रहा था। नहाने के बाद बड़े भाई ने सबसे पहले टॉवल से छोटे भाई को पोछा फिर साफ और सूखे कपड़े पहनाए और खुद भी पहने फिर वहाँ से दोनों हाथ पकड़कर अपने घर की ओर चल दिये। तभी छोटे भाई का पैर ज़रा सा फिसला तो बड़े ने उसे संभाला और आराम से चलने की हिदायत दी,जिसे छोटे ने पूरी तरह माना,कुछ देर बाद ये जोड़ी मेरी आखों के सामने से ओझल हो गई,पर जाते-जाते कई सारे प्रश्न छोड़ गयी,जैसे क्या कल ये भाई जब बड़े होंगे तब भी ऐसे ही रहेंगे ? क्या तब भी छोटा भाई हक़ से शरारतें करेगा ? क्या बड़ा भाई उसकी गलतियों को नज़रअंदाज़ करेगा ? क्या छोटे भाई के लड़खड़ाने पर बड़ा भाई उसका हाथ इसी तरह थामेगा ? और क्या बड़े भाई की समझाइश भरी डांट को छोटा भाई सीख मानकर अनूकरण करेगा। आज अपने परिवार और आस पड़ोस में अकसर देखता हूँ,अहंकार का चश्मा हर आँख पर चड़ा है। भाइयों में  अपने-अपने अहंकार की तुष्टि और एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रतिस्पर्धा है। क्यों किसी भी बात पर घर के बटबारे हो जाते है ? जहां कभी साथ खेले और बड़े हुये। क्यों शब्दों में तल्खी और नज़रों में घ्रणा का भाव बड़ने लगता है ? जिनमें कभी आदर का भाव था। क्यों आज बड़ा भाई छोटे भाई की किसी भी गलती को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाता ? क्यों छोटा भाई बड़े भाई की सीख भरी डांट को अपना अपमान समझने लगता है ? सवाल तो बहुत है,इनके जवाब शायद अलग-अलग लोगों के पास अलग-अलग हों,पर मेरे पास इसका सिर्फ एक ही जवाब है, कि अपने अंदर के बचपन को मरने न दें,अपनों के लिए मन में निश्छल भाव रखिए,प्रेम सदा पवित्र बना रहेगा। आप क्या सोचते हैं,अगर कोई उत्तर हो तो बताइएगा ज़रूर।  

Saturday, 16 February 2019

"PAUSE-शायद कभी कभी ले लेना चाहिए😀😀😀"

"PAUSE-कभी-कभी ले लेना चाहिए😀😀😀"
ज़िन्दगी में "Pause" कितना जरूरी है,ये मुझे शायद कल अच्छे से समझ आया कल मेरा एक सेमिनार में जाना हुआ।जहां पर एक स्पीकर को सुनने का मौका मिला जिन्होंने मन को साफ,खुश और हल्का रखने का तरीका बताया।ये कोई मेडिकल सेमिनार नही था,बल्कि कैसे अपने विचारों पर कंट्रोल करके मन को हल्का और साफ रखा जा सकता है,उस बात पर सेमिनार था।कि कैसे एक सेकंड का "Pause" आपके जीवन और आसपास होने वाली घटनाओं को बदल सकती हैं,मुझे वो बातें वहां सुनकर दैनिक जीवन का एक घटनाक्रम याद आया , ये दृश्य हमारे घरों में कभी न कभी घटित होता ही होगा,तो आइये देखते हैं,एक पतिदेव हैं जिन्हें सुबह आफिस जाने की जल्दी है,और वो आज लेट हो चुके हैं,घड़ी की तरफ देखते हुए अपनी पत्नी को चिल्ला कर आवाज़ देते हैं,क्यों अभी तक चाय भी नही बन पाई तुम्हारी,आज चाय नसीब होगी कि नही ? पत्नी जल्दी से आकर उन्हें चाय का कप टेबल पर रख देती है,पतिदेव जल्दी-जल्दी एक चुस्की चाय की लेते हैं और तुरंत सड़ा सा मुँह बनाकर पत्नी से कहते हैं,एक काम भी ढंग से नही होता तुमसे,कैसी वाहियाद चाय बनाई है तुमने,पत्नी कहती भी है कि दूसरी बना दूं,पर पतिदेव पहले ही लेट थे,तो चिड़चिड़ाते हुए कहते हैं की नही चाहिए,और आफिस के लिए निकल जाते हैं,उसी समय कामवाली बाई आती है,वो सिर्फ आज 5 मिनट देरी से आई पत्नी जी का पारा जो कि पतिदेव की बातों से गर्म था और भी चढ़ जाता है,और वो कामवाली की बात बिना सुने उसे खरीखोटी सुनाना शुरू कर देती है, कि तुम कभी टाइम से नही आ सकती,सुबह-सुबह मालूम है,काम कितना ज्यादा होता है वगेरह वगेरह.....
ये सब सुन कामवाली का दिमाग भी गर्म हो जाता है,वह बेमन से सारा काम निपटाती है,और जैसे ही बिल्डिंग से बाहर जाने को होती है,देखती है कि वॉचमैन जो कि उम्रदराज आदमी है की आंख लगी है,कामवाली पत्नी जी का सारा गुस्सा उस वॉचमैन पर उतारना शुरू कर देती है तुम लोगों का बढ़िया है,ड्यूटी पर भी सोते रहते हो, हम लोगों को काम करना पड़ता है,और न जाने क्या-क्या? जिसे सुन बिल्डिंग के कुछ बिल्कुल फालतू और पंचायती लोग वहां आकर सुर में सुर मिलाकर कहने लगते हैं,कि हां ये वॉचमैन तो यही करता है,अगली मीटिंग में ये मुददा को डिसकस करेंगे,इसे निकाल देंगे जैसी बातें शुरू।
अब जरा इसी सीन को दूसरे नज़र से देखते हैं,सुबह हुई पतिजी लेट हो गए हैं,जल्दी-जल्दी जूते पहनते हुए पत्नी को प्यार भरी आवाज़ देते है,सुनो क्या चाय तैयार हो गई? पत्नी मुस्कुराते हुए चाय का कप देती है,पति जी जैसे ही एक चुस्की लेते हैं,चाय खराब बनी है,जान जाते हैं,पर कुछ कहते नही,पत्नी को भी साथ चाय पीने का बोलते है, पत्नी भी ख़ुशी-ख़ुशी चाय की एक चुस्की लेती है,समझ जाती है चाय खराब बनी है और तुंरत पति से कहती है कि आप ये चाय मत पीजिये, ये अच्छी नही बनी मैं दूसरी बना लेती हूँ,पति उसे रोकता है,कोई बात नही,चाय मैं बाहर पी लूंगा,हो जाता है कभी-कभी,तुम परेशान मत हो,मैं आफिस के लिए निकलता हूँ।दोनों एक दूसरे को अच्छे मन से विदा करते हैं,उसी समय कामवाली जो 5 मिनिट देरी से आई नज़र बचाते हुए की पत्नीजी गुस्सा करेंगी,घर के अंदर प्रवेश करती है,पत्नीजी जिनका मूड अच्छा है, उससे सामान्य से प्रश्न करती है,क्या बात है?आज देर हो गयी आने में,तो कामवाली बताती है कि आज बेटे की तबियत ठीक नही थी,तो देर हो गयी,तुरंत पत्नी जी कहती है,अरे तो तुम जाओ वापस अपने बेटे को डॉक्टर को दिखाओ काम तो होता रहेगा,आज मैं कर लूंगी,साथ ही 50 रुपये भी देती है,कि जाते हुए फल ले जाना।कामवाली बाई फिर भी इस व्यवहार से खुश होकर काम को जल्दी से पूरा करती है,और बिल्डिंग से नीचे आती है,देखती है कि वॉचमैन जो कि उम्रदराज आदमी है शायद थकान की वजह से कुर्सी पर बैठे-बैठे उसकी आंख लग गयी,उसके पास जाती है,और धीरे से उन्हें उठाती है कि काका उठो ड्यूटी पर सोना नही,अभी कोई देख लेगा तो टोकेगा ,और उसकी कुशल छेम लेकर वहां से अपने घर निकल जाती है।
दोनों ही सीन में हर व्यक्ति द्वारा प्रतिक्रिया देने से पहले सिर्फ एक या दो सेकंड का "Pause" लिया गया,अपने विचारों के आवेग को दिशा देने के लिए।पहले दृश्य में पतिदेव बिना सब्र किये पत्नी पर बरसे तो वहाँ से एक के एक बातों के बिगड़ने की चैन शुरू हो गयी और ना जाने कितने लोग उससे तनावग्रस्त और दुखी हुए। वहीं दूसरे दृश्य में पतिदेव द्वारा मन में एक या 2 सेकंड का "Pause" देकर विचारों को कहने से पत्नी, कामवाली से लेकर वॉचमैन तक स्तिथियाँ वही थी,पर उन पर होने वाली प्रतिक्रिया कितनी बदल गयी। ऐसे घटनाक्रम रोज़मर्रा के जीवन में सबके साथ घटित होते ही रहते हैं। किसी भी स्तिथि पर प्रतिक्रिया देते वक्त अगर उस पर ज़रा सा "Pause" देकर अगर विचार कर लिया जाए तो बहुत कुछ बदल सकता है। घटनाक्रम के बाद किसी भी प्रकार का बोझ मन पर, दिमाग पर नही रहता। क्योंकि किसी भी तनावपूर्ण घटना के बाद वो हमारे मन पर असर करती है हमारा मन उसी बात के बारे में लगा रहता है कि उसने मुझसे ये कहा वो कहा मैंने उसे ये कह दिया वगैरह-वगैरह यही चलता रहता है। जिससे आपका मन कुछ और जरूरी बातों को गुणवत्ता पूर्ण तरीके से पूरा नहीं कर पाता जिससे हमारा जीवन,कार्यस्थल पर कार्यशैली बहुत ही ज्यादा प्रभावित होती है।साथ ही हमारा स्वभाव भी खराब और कभी तो चिड़चिड़ा हो जाता है।तो आप भी कभी-कभी मन में विचारों को ज़रा "Pause" देकर देखिये, शायद उससे होने वाली घटनाओं के परिणाम बदल जाये और मन पर कोई बोझ न रहे साथ ही मन हल्का हो जाये।

Wednesday, 6 February 2019

"असर-आज नही तो कल ज़रूर होगा "

    "असर-आज नही तो कल ज़रूर होगा "
आज तक सिर्फ सुना था, कि "जैसी संगत तैसा असर",लेकिन पिछले दिनों मेरे आंखों के सामने एक वाक़िया घटित हुआ,जिसने इस कहावत को मेरे लिए प्रमाणित कर सही साबित किया,बात कुछ दिन पुरानी है, मेरा एक परिचित के कार्यक्रम में जाना हुआ,साथ में मेरे एक मित्र भी थे जिन्हें पान,तम्बाकू और गुटका जैसे उनके अनुसार जीवनदायीं, अमृत के समान लगने वाले पदार्थों का सेवन अतिप्रिय है।इस बात पर कई बार हम दोनों के बीच बाद विवाद भी हुआ कि इनका सेवन करना सही है,या नही,मैंने एक मित्र होने के नाते कई बार उन्हें इसे छोड़ने को कहा पर वो न माने।कई बार उन्हें सामाजिक स्थलों पर इसे न खाकर जाने या न खड़े होने को कहा,तो बहानों की लंबी लाइन सुना देते। मैंने उन्हें कई बार टोका की सामाजिक स्थलों पर गुटखा का सेवन कर जाना और वहीं कहीं पर भी थूक देना आपकी प्रतिष्ठा को शोभा नही देता,और सामान्य तौर पर अति अशोभनीय कृत्य लगता है।पर वो मुझे प्रवचन न देने का कहकर बात बदल देते थे,पर उस दिन जब हम दोनों साथ उस कार्यक्रम में शिरकत करने गए तो उन्होंने प्रवेश से पहले अपने चिर-परिचित अंदाज़ में अपना पसंदीदा गुटखा निकाला और काफी heroism के अंदाज में अपने मुँह में उसे प्रवेश कराया,मैंने अपने मित्र होने का फर्ज फिर अदा करते हुए उन्हें ऐसा करने से रोका की सार्वजनिक क्षेत्र में इस तरह गुटखा,तम्बाकू का सेवन गलत है,कानूनन भी और सामाजिक सरोकार से भी,और अशोभनीय लगता है।पर उन्होंने मेरी बात इस बार भी अनसुनी कर दी। मैं भी हार मान कार्यक्रम स्थल की ओर बढ़ने में ही भलाई समझी और उनके साथ में अंदर चला गया। अंदर जाने पर कार्यक्रम बहुत अच्छा और भव्य था जहां लगभग सभी लोग सभ्य ही दिख रहे थे,जो अपने परिवारजनों, या मित्रों के साथ वहां आये हुए थे। जिनके मुँह में न तो गुटका था,न वो किसी प्रकार की तम्बाकू या नशीले पदार्थों का सेवन कर रहे थे।जिन्हें देखकर मेरे मित्र थोड़ी ही देर में थोड़ा असहज होने लगे,कि अरे यहां तो मेरे जैसा तो कोई भी नही कर रहा।उनकी असहजता बेचैनी में तब बदल गई जब उन्हें कहीं भी कोई गंदा कोना अपने मुँह में भरी हुई  भारी भरकम अद्वितीय गुटके की पीक को थूकने को नही मिल रहा था।क्योंकि सभी ओर साफ सफाई थी,कार्यक्रम स्थलका फर्श और कोने भी साफ और चमक रहे थे,साथ ही वहां आये हुए लोगों के चेहरे भी। जिसे देख कर मेरे मित्र को अपने इस क्रिया पर शायद पहली बार आत्मगिलानी का अनुभव हुआ और अगले ही पल उन्होंने मुझसे कहा कि उनका यह कार्य वाकई गलत है,कि वो सार्वजनिक जगहों पर इस तरह गुटके का सेवन करते है,साथ ही पीक को थूक-थूक कर यहां वहां गंदगी फैलाते है।ये सुन मुझे एहसास हुआ कि वाकई आपके द्वारा किये जाने वाले कार्यों और मिलने वाली प्रेरणा में आपके आसपास के माहौल का एहम योगदान है।जैसा वातावरण हमारे आसपास होगा वैसा ही हमारे आचरण व्यवहार में प्रदर्शित होगा।और मेरा विश्वास इस बात पर और भी ज्यादा बड़ा दिया की अगर आप अपने सही सोच और कार्य पर अडिग हैं,तो परवाह मत करिये आगे बढ़िए,कभी न कभी कहीं न कहीं लोग अपने बुरे विचार छोड़,आपके साथ सही रास्ते पर आगे बढ़ने लगेंगे।