पिछले दिनों एक शॉपिंग में माल में जाना हुआ खरीददारी के दौरान एक जोर की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी देखा तो एक माँ अपने बच्चे को डांट रही थी "जब खाना नहीं था तो लिया क्यों,तुम्हे पता नहीं कितना महँगा था ये,ऐसे ही बर्बाद करवा दिया,पैसे पेड़ पर नहीं उगते जो तोड़े और ले आये मेहनत करनी पड़ती है,समझे तुम्हे इसकी कीमत समझनी चाहिए" उनके इन्हीं शब्दों ने मुझे विचार करने पर मजबूर कर दिया,कि क्या हम वाकई फ्री में मिलने वाली चीजों की कद्र नहीं करते।कुदरत की दी हुई नेमत ही हैं,जो हमें उसकी हर एक चीज बड़ी ही आसानी से मुफ़्त में मिल जाती है कि हमें उसका मोल समझ नहीं आता,चाहे वो बारिश का पानी हो या कुदरत की हरियाली,मुफ्त में मिलने वाली ऑक्सीजन हो या ठंड के मौसम में मिलने वाली धूप की राहत,गर्मियों में उसी धूप की तपिस से बचाने के लिए पेड़ों से मिलने वाली छांव हो।सब "मुफ्त मुफ्त और बिल्कुल मुफ्त" किसी चीज का कोई पैसा नही,कोई GST नही,कोई टैक्स नही,कोई टिकट नही। है ना अलबेली बात इस कुदरत की,पर शायद यही अलबेलापन इस कुदरत के लिए श्राप बनता जा रहा है।आप,मैंऔर हम सब इस कुदरत की इज़्ज़त करना भूलते जा रहे हैं।जगह चाहिए या जरूरत पूरी करनी हो,पेड़ों को हम काट रहे हैं पर लगाना भूल रहे हैं,किताबों में बच्चे पेड़ों को बढ़ते तो देख रहे हैं,पर असल में कैसे ये सब हो जाता है,ये हम उन्हें नहीं दिखा रहे हैं।आज की पीढ़ी के बच्चों में से शायद कुछ ही प्रतिशत होंगे,जिन्होंने पेड़ से तोड़ कर आम या कोई फल खाया होगा।उनके लिये तो फलों का मौसम उस फल के बाजार में आने के बाद ही शुरू होता है,और जाते ही खत्म। आज जरूरत है तो हम सबको इस बेशुमार दौलत को सहेजने की ताकि आगे आने वाली पीढ़ी इसे देख सके, महसूस कर सके और उतना ही आनंद उठा सके,जितना आपके पहले वाली पीढ़ी और आज आप उठा रहे हैं।आज आपकी गलती की सज़ा आने वाले कल को भुगतनी पड़ेगी,अगर आप प्रकृति के सारे रंगों का दोहन आज ही कर लेंगे,तो उनके पास प्रकृति के पटल पर देखने के लिए रंग ही कहाँ बचेंगे।और क्या हो जब प्रकृति अपनी संपदा आप पर मुफ्त में लुटाने की जगह उसकी कीमत वसूलना शुरू कर दे,तब आप जुमलों में भी किसी से ये नही कह पाएंगे कि "पैसे पेड़ पर नहीं उगते जो मुफ्त में तोड़ लाये"।आज से ही शुरुआत करें,आप जहां भी रहते है वहां अपने आसपास कम से कम एक पेड़ ज़रूर लगाएं और उसे सहेजे भी,अपने बच्चों को समझाये की वो भी हर साल कम से कम एक पेड़ ज़रूर लगाएं आने वाले कल के लिए,वरना वो दिन दूर नहीं जब ये सब देखने के लिए भी टिकट लेना पड़ेगा।
Wednesday, 4 July 2018
Tuesday, 12 June 2018
"ध्येय ya श्रेय"
"ध्येय yaश्रेय"
ये दो शब्द जिनके मायने तो बहुत जुदा है,पर अगर देखा जाए तो ये बहुत हद तक किसी के तररक्की की राह कैसी होगी और कहां तक जाएगी ये तय कर सकते हैं।एक टीम जब बनती है तो ज्यादातर लोग एक गलती करते हैं वो ये की वे अपनी टीम के सदस्यों का चुनाव उनके गुणों के आधार पर या सफल होने की भूख को देखकर नही बल्कि अपनी अनुकूलता के आधार पर करते है।जहां कई बार ऐसी टीम का भविष्य और उसकी सफलता का दृश्य निर्भर सिर्फ इस बात पर करता है कि वह टीम जिस लक्ष्य को पाने का सपना देख रही है उस तक पहुंचने के लिए होने वाले या किये जाने वाले प्रयासों में टीम के लोगों का बर्ताव कैसा है क्योंकि यहां प्रयास सफल होंगे या नही वो इस सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करते की प्रयास सही दिशा में हो रहा है या कितना किया जा रहा है।साथ साथ इस बात पर भी निर्भर करता है कि टीम के सदस्यों की अपेक्षा कैसी और काम के प्रति व्यवहार कैसा है क्या वो हर प्रयास को लक्ष्य तक सफलता के साथ पहुँचने के "ध्येय"से कर रहे है चाहे लीडर कोई भी हो या प्रयास से सफलता मिले न मिले उनका लक्ष्य सिर्फ "श्रेय" पाना है चाहे लक्ष्य और प्रयास का हश्र जो भी हो।
उनकी नज़र में टीम का लक्ष्य उसके लिए किए जाने वाले प्रयास और उनसे मिलने वाली सफलता कोई मायने नही रखती,जब तक कि इन्हें हर कदम पर "दूल्हा" न बनाया जाए मतलब"श्रेय" न दिया जाए।वरना ऐसे लोग मुँह फुलाकर ये कहने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं "हमसे किसी ने कहा ही नही" कोई कहता तो हम भी कर देते।
वो ये भूल जाते है कि वो जिस पल टीम के सदस्य बने उसी पल से वो अकेले नही रहे बल्कि टीम का हिस्सा बन गए थे।
उनका "ध्येय" खुद प्रयास करना या बाकी सदस्यों द्वारा किये जा रहे प्रयासों को सफल बनाने में योगदान देना होना चाहिए। न कि सिर्फ श्रेय लेने की लालसा रखना,वो क्यों भूल जाते हैं,कि अगर टीम ने सफलता प्राप्त की तो उसका श्रेय तो उन्हें मिलेगा ही।तो अगली बार जब भी टीम का हिस्सा बने तो आपका 'ध्येय' टीम को लक्ष्य तक पहुंचाना होना चाहिए,न कि 'श्रेय' लेने की कोशिश करना या कभी टीम बनाये तो साथियों का चुनाव अनुकूलता के आधार पर नही,बल्कि उनके गुणों और मेहनत कर सफल होने की भूंख के आधार पर करियेगा,मंज़िल पर आधी फतह तो आपको उसी पल मिल जाएगी।
Monday, 4 June 2018
I AM "BUSY"
I AM "BUSY"
जग घुमाया पर इनके जैसा न कोए"इज़ी" ज़िन्दगी को "बिज़ी" कहे,
न जाने किस भव सागर में खोए,
जग घुमाया पर इनके जैसा न कोए.....
काल खण्ड की हर बेला में हर पल,
काहे भैया मुँह बनाकर कर रोए,
समझ न आवे हमको अब ये,
दीन दुनिया के कोंन बोझ को ढोए,
जग घुमाया पर इनके जैसा न कोए.....
परिवार संग हंस न पावे खुल कर ,
फिर भी सेल्फी नौ-नौ मुँह बनाकर ले बिना मुँह धोये,
जग घुमाया पर इनके जैसा न कोए.....
देख नॉटंकी "बिजी-बिजी" की,
'संयोग' को खुद फोकट सा महसूस होए,
जग घुमाया पर इनके जैसा न कोए.....
ना जाने चकराघाट की चकरघिनि सो,
मानुस घनघोर भ्रमित काहे को होए,
जग घुमाया पर इनके जैसा न कोए.....
बात पाते एक है भैया,और दूजा न कोए,
जो काम करत है,सो आगे बढ़त है,
वो रहे "बिजी" पर "बिजी" न होए,
जो कहे "बिजी" पर हो न "बिजी",
और ढेला भर का काम करे न कोए,
तो ऐसे लोगन का बंटाढार निश्चित ही होए,
जग घुमाया पर इनके जैसा न कोए.....
Sunday, 22 April 2018
आगाज़ करना होगा.......
आगाज़ करना होगा.......
कुछ पल रुक गया था मैं,
सफर में चलते चलते,
देखने ये कि कौन-कौन चल रहा है साथ मेरे दिल से,
रुक कर जाना कि अगर दिल मेरा है तो ,
धड़कन भी मुझे ही बनना होगा,
किसी पर ऐतबार से ज्यादा,
जीत के जुनून को कायम रखना होगा,
रोकने से कब रुका था मैं,
भरोसा रब पर और उसकी इनायत पर रखना होगा,
कर लिया आराम बहुत ले ली है अंगड़ाई ,
अब आगे कूच करना होगा,
है इरादा गर मंज़िल पाने का ,
तो जंग का आगाज़ करना होगा।
कुछ पल रुक गया था मैं,
सफर में चलते चलते,
देखने ये कि कौन-कौन चल रहा है साथ मेरे दिल से,
रुक कर जाना कि अगर दिल मेरा है तो ,
धड़कन भी मुझे ही बनना होगा,
किसी पर ऐतबार से ज्यादा,
जीत के जुनून को कायम रखना होगा,
रोकने से कब रुका था मैं,
भरोसा रब पर और उसकी इनायत पर रखना होगा,
कर लिया आराम बहुत ले ली है अंगड़ाई ,
अब आगे कूच करना होगा,
है इरादा गर मंज़िल पाने का ,
तो जंग का आगाज़ करना होगा।
Saturday, 24 March 2018
"संवाद और संबंध"
आरम्भ करूं उसके पहले सारगर्बित सामान्य कथन - "वो क्या है जी की आजकल की generation ही ऐसी है, बच्चे आजकल बहुत smart हो गये है उन्हें कुछ बताना नही पड़ता है,या ज्यादा समझाने की ज़रूरत नही,बच्चे सब कर लेते हैं। या माहौल आजकल ऐसा है जी क्या करें?"
अक्सर देखता हूँ ,सुनता हूँ और महसूस भी किया है कि जैसे जैसे एक बच्चे की उम्र बढ़ना शुरू होती है ,मतलब जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है,वैसे-वैसे उसकी और उसके माता पिता के बीच होने वाला संवाद कम होता चला जाता है। कई बार माता-पिता ये कहते हुए भी पाए जाते है,कि उनका बेटा पता नही कहाँ गया होगा,अरे भाई होगा कहीं अपने दोस्तों के साथ, कब आता है,कब जाता है,पता ही नही चलता। कभी माता-पिता से गलती से भी पूंछ लो कि कौन से दोस्त है बच्चे के,तो पेरेंट्स को तो कई मौकों पर खुद भी पता नहीं होता कि आज कल उनके बच्चों के कौन से दोस्त है,उनके नाम क्या है,कहाँ रहते हैं,और क्या करते हैं?
पर गहराई से देखें तो क्या ऐसा हमेशा से था? याद कीजिये बचपन में जब भी आपका बच्चा स्कूल से आता था, सिर्फ आपके एक बार पूंछने पर की स्कूल कैसा रहा,क्या क्या किया आज,एक सांस में अपने दिनभर का व्योरा दे देता था।कि सुबह जाते वक़्त स्कूल बस में किसके साथ बैठा,क्लास में क्या-क्या पढ़ाया गया,क्या शब्बाशी मिली, क्या शैतानी करने पर punishment मिली,lunch box किसके साथ share किया,क्या क्या games खेले सब कुछ,अपनी हर परेशानी, हर मांग,अपनी हर चिंता को आपके साथ बाँटता था।पर अचानक क्या हुआ कि सब कुछ बदल गया आज आपको उसका daily routine का ठीक से पता नही और न ही ये की उसकी जिंदगी में क्या चल रहा है।
पर इस बात की ओर कम ही लोग ध्यान देते हैं और अगर दिया भी तो समस्या की जड़ तक कम ही लोग पहुंचते हैं। और अक्सर ये कहते हुए सुने जा सकते है कि "वो क्या है जी कि आजकल की generation ही ऐसी है, बच्चे आजकल बहुत smart हो गये है,उन्हें कुछ बताना नही पड़ता है,ज्यादा समझाने की ज़रूरत नही बच्चे सब कर लेते हैं। या माहौल आजकल ऐसा है जी क्या करें? ज्यादातर लोग पेड़ के न पनपने के लिए कभी बीज को ,कभी मौसम को,तो कभी मिट्टी को दोष देते है।असल बात ये है कि पेड़ को पनपने के लिए दिए जाने वाले लालन-पालन को भी समय के साथ बदलते रहना पड़ता है।जैसे कभी ज्यादा पानी,तो कभी सही खाद,तो कभी सही तापमान देना पड़ता है तभी जाकर वो सही पनपता है।ठीक उसी तरह आपको भी अपने बच्चों के साथ समय के साथ उनकी और अपनी उम्र के अनुसार अलग अलग व्यवहार करना चाहिए कभी बड़े बनकर तो कभी दोस्त बनकर आपसी जुड़ाव को और पक्की तरह से मजबूत करना चाहिए न कि कुछ बहानो की आड़ में बचपन में बोये गए प्यार,स्नेह और अपनेपन के बीज को खराब होने देना चाहिए।
Sunday, 25 February 2018
"अमरूद का मौसम"
"अमरूद का मौसम"
अमरूद का फल किसे पसंद नही ?अगर ये सवाल किसी से भी पूंछो तो शायद ही कोई हो जो न कहे।कहने को तो अमरूद सिर्फ एक फल है । जो नाम के साथ-साथ स्वाद में भी लाजवाब है,पर शायद कभी-कभी एक अमरूद किसी के जीवनभर का बहुत बड़ा पल दे जाता है।ऐसी ही एक घटना याद आती है,जो दो लड़कियों के बीच घटी "ऋतु और शिवानी",दोनों ही शक्षम मध्यम वर्गीय परिवार से थी उम्र में कोई खास अंतर नही था दोनों अच्छी दोस्त थी और साथ ही पड़ोसी भी जो सोने पर सुहागा था।साल के सारे मौसम एक दूसरे ये एक दूसरे की पक्की सहेली थी,सिवाय एक मौसम के,वो था अमरूद का मौसम।बात कुछ यूं थी कि इन दोनों के घर के बीच अमरूद का पेड़ था,जिसपर मौसम आने पर खूब अमरूद आते थे ,इस पेड़ की जड़ शिवानी के घर में थी सो शिवानी खुद को इस पेड़ की मालकिन समझती थी और पूरी गुंडागर्दी के साथ अमरूद के एक-एक फल को अपना मानती थी।ऋतु के घर कोई कमी नही थी,घर में कई बार तो बाजार से टोकनी भरकर अमरूद आते थे,पर कहते है न मन पर किसका ज़ोर है वह कितने भी अच्छे अमरूद खा ले पर जब तक वह शिवानी के घर के पेड़ का अमरूद चख न ले उसे मज़ा नही आता था।बस यही बात इन दोनों के बीच अमरूद के मौसम में दोस्ती पर बर्फ जमा देती थी।कई बार तो नोबत लड़ाई और बोलचाल बंद होने तक पहुँच जाती।परिवार के बड़े समझाते पर ये दोनों न मानती।शिवानी पेड़ के एक एक अमरूद की गिनती रखती और ऋतु भी अपने घर की ओर आने वाली शाखा के अमरूद खाने के लिए कई बार छुपकर इंतज़ार करती,कि कब शिवानी की नज़रों से बचकर वह एक अमरूद खा ले।यह जीत उसके लिए किसी वर्ल्डकप से कम न थी।
ऐसी ही एक दोपहर वह छुपकर छत पर गई उसे पता चला कि शिवानी एक दिन के लिए किसी शादी में गई है, तो खुश होकर उस अमरूद को तोड़ने गई जो छत की सीढ़ियों से लगी डगार पर पक चुका था।शाखा थोड़ी ऊंची थी ऋतु ने काफी कोशिश की पर वो पहुंच नही पा रही थी।वह आपने कदम उछाल उछाल कर उस तक पहुचने की कोशिश कर रही थी। कि अचानक उसका पैर सीढ़ियों से फिसल गया और उसके पैर में मोच आ गई और दर्द से कराह रही थी। कुछ देर के बाद वो पलंग पर थी और आंखों में आंसू लिए रो रही थी। शाम को जब शिवानी घर लौटी तो उसे उसकी माँ से पता चला कि ऋतु का पैर मोच गया है और वह चल भी नही पा रही है। शिवानी को बहुत दुख हुआ वह तुरंत वही अमरूद अपने घर से तोड़कर हाथ में लिये ऋतु के घर गयी और सीधे उसके कमरे में पहुँची जहां ऋतु अभी भी दर्द के मारे उदास लेटी अपने पैर की पट्टी को देख रही थी।तभी शिवानी को देख चौक गई। शिवानी ने आगे बढ़कर अमरूद ऋतु के हांथों में रख दिया और बिना कुछ कहे ही दोनों एक दुसरे की सारे बातें समझ चुकी थीं। कहा तो सिर्फ इतना कि "यह लो तुम्हारे पेड़ का अमरूद"।
कई सालों से जो बर्फ इनकी दोस्ती पर अमरूद के मौसम में जम जाती थी,वह इस साल हमेशा के लिए पिघल चुकी थी,और दोनों सहेलियां अब हसीं मज़ाक़ कर रही थी।
समय बीता साल भी बीता अगले साल फिर "अमरूद का मौसम"आया अमरूद लगे,पर इस साल न शिवानी एक एक अमरूद गिन रही थी,न ऋतु छिपकर अमरूद तोड़ रही थी।क्योंकि अब वो पेड़ और उसके अमरूद दोनों के थे।
Wednesday, 14 February 2018
क्या ये खता है मेरी.....
क्या ये खता है मेरी.....
क्या ये खता है मेरी.....
कि नियत मेरी सच्ची है,खुदा पर भरोसा रखता हूँ
क्या ये खता है मेरी.....
कि हर मुकाम को मेहनत और खुदा की रहमत से पाना चाहता हूँ
क्या ये खता है मेरी.....
कि देखे हैं कुछ छोटे छोटे सपने,
और रखता हूँ उन्हें पूरा करने की चाहत
क्या ये खता है मेरी.....
कि काम को सिर्फ काम नही
जुनून मानकर पूरा करता हूँ मैं
क्या ये खता है मेरी.....
कि ना जाने क्यों हर बात में
नफा नुकसान का हिसाब लगाते है लोग
ना हो रहा हो खुद का नफा या
न कर पा रहे हों किसी का नुकसान
तो अच्छे काम के लिए आगे भी नही आते है लोग
क्या ये खता है मेरी.....
बनाते है लोग नेक काम न करने के बहाने
छिपाते हैं कई लोग अपनी नाकाबिलियत और कमियां
करके बहाने कि बहुत व्यस्त हैं,मिलता नही हमें वक़्त है
पर मैंने ठाना है,साथ दे या न दे कोई मेरा,
गर रहमत है खुदा की मुझ पर
तो कर लूंगा हर मुश्किल को पार
मुझे पाना है हर मंज़िल हर मुकाम हर बार
ना थकूंगा न रुकूंगा न मानूंगा हार
अगर है इरादा ये मेरा
तो क्या ये खता है मेरी.....
क्या ये खता है मेरी.....
कि हर मुकाम को मेहनत और खुदा की रहमत से पाना चाहता हूँ
क्या ये खता है मेरी.....
कि देखे हैं कुछ छोटे छोटे सपने,
और रखता हूँ उन्हें पूरा करने की चाहत
क्या ये खता है मेरी.....
कि काम को सिर्फ काम नही
जुनून मानकर पूरा करता हूँ मैं
क्या ये खता है मेरी.....
कि ना जाने क्यों हर बात में
नफा नुकसान का हिसाब लगाते है लोग
ना हो रहा हो खुद का नफा या
न कर पा रहे हों किसी का नुकसान
तो अच्छे काम के लिए आगे भी नही आते है लोग
क्या ये खता है मेरी.....
बनाते है लोग नेक काम न करने के बहाने
छिपाते हैं कई लोग अपनी नाकाबिलियत और कमियां
करके बहाने कि बहुत व्यस्त हैं,मिलता नही हमें वक़्त है
पर मैंने ठाना है,साथ दे या न दे कोई मेरा,
गर रहमत है खुदा की मुझ पर
तो कर लूंगा हर मुश्किल को पार
मुझे पाना है हर मंज़िल हर मुकाम हर बार
ना थकूंगा न रुकूंगा न मानूंगा हार
अगर है इरादा ये मेरा
तो क्या ये खता है मेरी.....
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