Thursday, 26 March 2020

“कहानियाँ-कुछ अपनी सी अपनों के लिए”


               कहानियाँ-कुछ अपनी सी अपनों के लिए

कहानियाँ कल्पना की उड़ान पर ले जाती हुई,सफर की एक ऐसी गाड़ी जिस पर चड़कर हम ना जाने कितने सारे भावों के समुंदर में मनचाहे गोते लगाते हैं,यही तो है,जो हमें बचपन में बिस्तर पर लेटे-लेटे ही परियों के देश में ले जाया करती है,वही कहानियाँ जो हमें कई बार मीठे ख्वाब दिखाती है,कई बार बहुत बड़ी-बड़ी सीखेँ दे जाती है,और कई बार तो जीवन में कुछ बड़ा और महत्वपूर्ण करने की प्रेरणा देकर,हमारी सोच और जीवन की धारा को ही मोड़  देती है,कहने को तो ये कहानियाँ  सिर्फ कुछ पलों का जिक्र होती है,पर इनकी छाप जीवन के राह पर कई बार एक अमिट छाप और रंग छोड़ जाती है,बचपन तो हम सभी को याद होगा अपना-अपना,जिसका ये कहानियाँ एक अभिन्न हिस्सा रही,इन्ही ने हमें हँसाया,कभी मनोरंजन दिया,तो कभी रोमांच से भर दिया,शायद यही तो थी वो जिन्होनें हमें एक आदर्श,प्रगतिशील जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। कई किरदार इनके अंग बने कभी कोई राजा या वजीर,तो कभी कोई साधू या फकीर,कभी कोई महापुरुष,तो कभी कई बार जंगल के जानवर भी सीख और नेकी  की राह दिखाते हमारी कहानियों का हिस्सा बने। यही कहानियाँ तो थी,जिनसे रूबरू हो हम सुखद आनंद के आकाश में उड़ते हुये एक मीठी और निर्मल नींद का आनंद लेते थे।
आज कहानियाँ का जिक्र इसीलिए इतना कर रहा हूँ,क्योंकि ये कहानियाँ अपनी ज़िंदगी का बहुत अपना सा किस्सा और बेहद एहम हिस्सा सा लगती है,एक बचपन को सही दिशा में ढालने में ये कहानियाँ बहुत एहम किरदार अदा करती है।
पिछले कुछ समय एक समस्या हर parents के मुंह  से सुनने मिलती हैं कीआजकल बच्चे सुनते नहीयाउनके जीवन में क्या चल रहा हैं पता नहीयाआजकल बच्चों को privacy चाहिए,पर याद कीजिये क्या ये समस्या आपके बचपन में आपके पैरेंट्स को आपसे थी? शायद नही क्योंकि इन सभी का हल ये कहानियाँ ही थी और आज भी  हैं,जिनके जरिये आप अपने और अपने बच्चों के बीच एक healthy संवाद स्थापित कर सकते हैं,जैसा आपके parents और grandparents ने आपको सुनाकर उनके और आपके बीच किया और आप आज एक अच्छे इंसान बन सके,बचपन में बच्चों को कहानियाँ सुनाना उनके मानसिक,बौद्धिक और चारित्रिक विकास में भागीदार बनता है।
वो कुछ पल जब कोई कहानी कहता है,और कोई कहानी को सुन रहा होता है,तो उन पलों में बहुत सी घटनाएँ अप्रत्यक्ष रूप से चल रही होती है,जो की दोनों ही व्यक्तियों के जीवन में बहुत ही एहम बदलाव के बीज बो रही होती है,और यही बीज सकारात्मक बदलाव का पेड़ बन,भविष्य की नींव रखते हैं। जब आप घर के बड़े अपने बच्चों को कहानियाँ सुनाते हैं,तो उनके और बच्चों के बीच एक अनदेखा भावनात्मक संवाद बन जाता है,जो परिवार के  सदस्यों में bond को और भी मजबूत बनाता है,उनके बीच आदर सम्मान के भाव को पैदा करता है,बड़ों को अपनी बात कहने और उन्हें बच्चों को समझाने में ये कहानियाँ एक पुल का काम करती है, इन्हें सुनाने और सुनने के बहाने ही सही आप दोनों अपने 24 घंटे के schedule में कुछ पल एक दूसरे को देते हैं,जिससे बच्चे के मन और जीवन में क्या चल रहा हैं,उसे parents को समझने में आसानी होती हैं,और भावनात्मक संवाद की इस पहल से उनके बीच रिश्तों की डोर और भी मजबूत होती चली जाती है, एक कहानी किसी के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में कितनी मददगार बन सकती हैं,इसे समझने के लिए किसी उदाहरण की जरूरत नही है, बस जरा आप आपने खुद के flashback में जाइए और अपने बचपन को याद कीजिये,की जो कहानियाँ आपने अपने बचपन में सुनी उनका आपके जीवन में कितना गहरा मूल्य रहा और,उन कहानियों ने आपके जीवन को कितना प्रभावित किया,और अगर जवाब हाँ में मिले तो आज से ही अपने बच्चों को भी उन्हीं कहानियों का अनमोल तोहफा दीजिये,और ले जाइए उन्हें भी पारियों के देश,नंदन वन में चीकू खरगोश और शेरू से मिलवाने,नन्ही पिंकी जो शरारतें करती और सीखती है,देश प्रेम से भरे वीरों से मिलवाने,बहुत कुछ था और हैं,सुनाने को। तो जनाब और मोहतरमा फिर देर किस बात की,उनके और अपने बीच रिश्तों की गर्माहट को और गहरा कीजिये,जो कभी आपको मिला,तो तैयार हैं कहानियाँ सुनाने को।  

Monday, 24 February 2020

बचपन या मोबाइल?.........चुनाव आपका


बचपन या मोबाइल?.........चुनाव आपका

पिछले कई दिनों से एक अजीब सन्नाटा सा पसरा है,मेरे,हमारे,हम सबके मुहल्लों की गलियों में,घर की छतें भी सूनी पड़ी हैं अजीब-सी खामोशी है, पता किया तो जानकारी मिली की मुहल्ले के बच्चे खेल रहे हैं,मैंने पूछा कहाँ खेल रहे है,पास वाले मैदान में ? तो कहा,नहीं तो फिर आश्चर्य से मैंने पूछा कि कहा खेल रहे हैं भाई?,तो बताया गया,कि कमरे में बैठे सब खेल रहे हैं,तो मुझे लगा ऐसा क्या खेल रहे हैं,कि आवाज़ भी नही आ रही हैं और खेल चल रहा है,उत्सुकतावश मैं उस कमरे की तरफ बढ़ चला,जहां बच्चे खेल रहे थे,देखा तो पाया की बच्चे मोबाइल पर सभी अपनी-अपनी जगह बैठे थे,और लगे थे मोबाइल पर खेल को खेलने मेंयह नजारा कोई अजीब या खास नही, जो मैंने यहां आप लोगों के साथ शेयर कर रहा हूं,कहीं ना कहीं आप लोगों ने भी यह नज़ारा अपने घर के आसपास अधिकांश देखा होगा। यह एक आम नजारा हो गया है,जो कहीं ना कहीं हम सब के आसपास बच्चों के बचपन में अपनी जगह बनाता और  पैर पसारता जा रहा है। मैं यहाँ यह नहीं कहना चाहता,कि वह जमाना अच्छा था,यह जमाना अच्छा हैं या वह खराब था या यह खराब है। पर कहीं ना कहीं मोहल्लों में बच्चों की वह अठखेलियां गुम होती जा रही है,गर्मी की छुट्टियों में बच्चों का गलियों में क्रिकेट खेलना,गिली-डंडा खेलना,कंचे खेलना,छत पर पतंग उड़ाना यह सब कहीं ना कहीं गुम होता जा रहा है। कभी कहीं कुछ माता-पिता इस बात को लेकर खुश होते थे, या कहूं,होते होंगे या होना चाहिए कि उनका बेटा या बेटी फलाँ खेल में या एक्टिविटी में अच्छे है,गिटार अच्छा बजाते है,हारमोनियम अच्छा बजाते है,गाना अच्छा गाते,या कोई खेल अच्छा खेलते है। यह बात अब सुनने को कम मिलती है,पेरेंट्स अब इस बात पर ज्यादा खुश होते हैं कि मेरा बच्चा मेरा लाल गोपाल जो हैं वो मोबाइल बड़ा जल्दी unlock कर लेता है,अपने आप से mobile का उपयोग कर लेता है,वो मोबाइल पर गेम खेल लेता है।आज  माता-पिता या बड़े,बच्चों को दोष देते हैं,बड़ी ही आसानी से कह देते हैं की “ये आज कल के बच्चे.........”,सिक्के के दूसरे पहलू को भी देखिए जनाब,कहीं ना कहीं यह गलती माता-पिता और बड़ो की भी तो है,जो आज बच्चों की इस बात को तरजीह ज्यादा देते हैं,कि उनके बच्चे ने अपने पैरों पर चलने से पहले मोबाइल चलाना सीख लिया। बोलने से पहले टीवी पर रिमोट से चैनल बदलना सीख लिया,लोगों के सामने बड़े  चाव से शेखी बघार के सुनाते हैं।एक पुरानी कहावत है,कहते हैं कि “बच्चों की पहली पाठशाला घर में होती है”।अंदाजा लगा लीजिए पहली पाठशाला में उसके अभिभावक उसे किस रोल के लिए शाबाशी दे रहे हैं। जरा अंदाजा लगाइए कभी आपसे कोई यह पूछे कि आपका बच्चा किस चीज की hobby रखता है? तो आप बताएं कि वह मोबाइल चलाने की हॉबी रखता हैं,तो कैसा अटपटा लगेगा, पब्जी खेलने में एक्सपर्ट हैं या कभी यह बताएं कि वह किसी एप को चलाने या ऐप खोलने में एक्सपर्ट है, तो कितना अजीब लगेगा,कौन सा गेम खेलता है? और आप यह कहे कि मोबाइल में गेम खेलने में एक्सपर्ट हैं,तो कितना अजीब लगेगा। कभी आपने अंदाजा लगाया कि आपको बचपन में जो चीज़े और गेम खेलने के लिए मिला करते थे,वो जाने अनजाने आपको ना जाने ज़िन्दगी के कितने पाठ पढ़ा देते थे,और कई सारे गुण अपने आप विकसित कर देते थे, जैसे team games में cricket जब आप खेला करते थे,तो अपने आप समूह में रहकर खुद से पहले आपमें टीम के बारे में और साथ ही साथियों के बारे में सोचने का गुण अपने आप विकसित हो जाता है,किसी साथी पर भरोसा इतना जबरदस्त हो जाना,कि सिर्फ इशारे पर आप run लेने के लिए दौड़ जाए ये सिर्फ खेल ही आपको सिखा सकते हैं। बचपन में जब आप घर की छत पर खड़े हो पतंग उड़ाते थे और हवा के चलने की दिशा का अंदाज़ा लेकर सिर्फ डोर की मदद से पतंग को हवा में अलग-अलग दिशा में लहराया करते थे,तो देखने में तो बहुत ही सामान्य  सी बात लगती है,लेकिन अगर जरा गौर से सोचा जाए तो अनजाने में ही आप science के कई सिद्धान्तों का प्रयोग कर जाते थे, जैसे हवा की दिशा के अनुसार पतंग को उड़ाना, साथ ही हवा में कई मीटर ऊंची पतंग पर concentrate करना भी आपकी ध्यान छमता को बढ़ाता है,कबड्डी” का खेल शारीरिक के साथ-साथ मानसिक फुर्ती को स्वाभाविक रूप से विकसित कर देता है और साथ ही विपरीत हालातों में भी हार ना मानकर उनसे लड़कर अपने पाले में वापस आना असल ज़िंदगी में भी हालातों से टक्कर लेने की छमता को विकसित कर देता है,गली में खेला जाने वाला “गिल्ली डंडे” का खेल कहने को तो सिर्फ एक लकड़ी के टुकड़े को मारने का मामूली सा दिखने वाला खेल है,लेकिन उस गिल्ली को मारने उसके उछलने और मारने की पूरी प्रक्रिया के दौरान हुआ घटनाक्रम speed ,time और distance के perfect combination में अपने आप ही सिखा देता है,list बड़ी लंबी है साहब गिनाने बैठे तों,पते की बात तो ये है,की इन सभी खेलों को खेलने के दौरान होने वाला शारिरिक श्रम एक स्वस्थ शरीर की नींव रखने में मददगार होता है, जो बचपन से natural immunity को विकसित कर देता हैकई ऐसी चीजें थी जो आपको अपने बचपन में मिली और आपको एक बेहतर इंसान बनने में मदद मिली,इसका उलट आपके बच्चे आज इन सब चीजों से दूर एक आर्टिफिशियल दुनिया का हिस्सा बनते जा रहे हैं और उसके आदि हो रहे है, मैं यहां बहुत ही पुख्ता तरीके से और सख़्ती से ये बात कहना चाहूंगा,कि गलती इसमें उनकी नही आपकी है,आप जिम्मेदार हैं,उन्हें उस दुनिया का हिस्सा बनाने के लिए,आप कभी ये कोशिश ही नही कर रहे,कि आपके बच्चे को भी वही नायब बचपन मिले जो कभी आपको मिला,आप उन्हें ऐसी चीजों की ओर प्रोत्साहित कर रहे हैं,जिनकी वजह से वो स्वस्थ्य और स्वाभाविक जीवंत दुनिया से दूर हो रहे हैं, रिश्ते और भावनाएं उनके लिए महत्वहीन होती जा रही हैं। घर में परिवारजनों के बीच बैठक कर आपने जो हंसी ठिठोली की होगी वो इससे इतर पारिवारिक कार्यक्रमों के दौरान उसका हिस्सा बनने की जगह सभी के बीच बैठकर भी वो मोबाइल को तरजीह देते हैं।और इस आदत को आप काफी बड़ा चड़ाकर उनके गुणों के साथ जोड़कर लोगों के सामने शेखी बघारने से भी परहेज़ नही करते की “अरे भाई ये आजकल के बच्चे हैं”।एक सत्य यह भी हैं,बच्चे काफी हद्द तक अपने अभिभावकों की क्रियाओं और प्रतिक्रिया को देखकर अपनी आदत और चीजों में ढलते है। अगर आप अभिभावक होकर अपने बच्चों की इस गलत कार्य को सराहना के रुप में प्रस्तुत करेंगे तो वे भी इसे सही मानेंगे।मैं यहां ये कहने की चेष्टा नही करहा कि बच्चों को आज के technology युग में आप gadgets  से दूर करें या latest updates न रहने दें,क्योंकि आज ऐसा कर पाना असंभव है,जरूरतों और सहूलियतों के लिए technology से जुड़े रहना बेहद जरूरी है,लेकिन जितना जरूरी हैं उतना,मोबाइल का उपयोग करें,पर कहीं ऐसा न हो कि मोबाइल आपका उपयोग करने लगे”।आपकी सोच समझ और विचारों पर हावी हो जाये,और वो दिन बहुत ही बदकिस्मती का होगा कि आपको अपने मस्तिष्क में विचारों का शून्य नज़र आये,और कुछ भी सोचने समझने और कहने से पहले मोबाइल और इंटरनेट का सहारा लेना पड़े।तो बच्चों को आज से अभी से मोबाइल का सदुपयोग सिखाये, उनके बचपन में वो घर के बाहर की गलियों के खेल के रंगों की सतरंगी छटा को बिखेर दें,आप भी देखेंगे कि कैसे उनका शारिरिक, मानसिक,बौद्धिक विकास के साथ साथ भावनात्मक दृष्टिकोण में कितना सकरात्मक विकास होता है।तो इस बार छुट्टियों में बच्चों की किलकारी गलियों में सुनाई देगी ना,आइए मिलकर कोशिश करते है,जो हमें मिला,अब इस नई पीढी की पौध को भी देते हैं यही तो कल के पेड़ बनेंगे जैसा आज आप और हम बने हैं

Tuesday, 21 January 2020

मतलब क्या है???

मतलब क्या है???

अगर खता करूं तो खूबसूरत करूं,
वरना खता करने का मतलब क्या है, 
होऊं बदनाम तो तुझ जैसे हसीन ख्वाब के लिए होऊं,
वरना बदनामी का मतलब क्या है,
दूर रहूँ तो तड़प तेरे दिल में मेरे लिए भी शिद्दत से उठे,
वरना दूर रहकर सज़ा सहने का मतलब क्या है,
हो साथ गर तो रहे सदा अंतिम सांस तक तेरा साथ मिले,
हल्की-फुल्की इश्क़-मुश्क की बाजी में
दिल लगाने का मतलब क्या है,
अगर आये तू कभी जो  हाँथ पकड़,करूंगा स्वागत इन बाहों में फिर किस बात से डरना क्या है,
मत आयो करो करने परेशां यूँ,
झूंट मूट में ख्वाबों में आने से मतलब क्या है,
यूँ मुहब्बत का हसीं ख्वाब बनकर,
जो तू मेरी नींदों को उड़ा जाती है,
इस हँसी ख्वाब को गर हकीकत न बना सका,
तो फिर ख्वाब देखने का मतलब क्या है,
हर एहसास छूकर ही महसूस हो ये जरूरी तो नहीँ,
मेरे एहसासों की गर्मी को तुझ तक न पहुंचा पाया,
और तेरे साँसों की खुशबू न दिल में अपने बसा पाया,
तो लानत है मुझपर और ऐसी मुहब्बत होने का मतलब क्या है,
रश्क होती होगी उस आसमाँ के चाँद को तुझे देखकर
जब तू  हांथों में हाँथ लिए चांदनी रात में ,
मेरे साथ घर से निकलता है,
ये जज़्बातों का सैलाब है जनाब,
एहसासों के समंदर से निकला है,
कश्ती को किनारे लगाने की क्या खाक कोशिशें करना,
जो इन लहरों में न डूबे तो क्या तुम हमारे और हम तुम्हारे
ये मानने का मतलब क्या है,
सिर्फ ये कहना कि पसंद हो तुम नाकाफी है,
इज़हारे-ए-मुहब्बत में,
जज़्बा और जूनून जब तक एक दूजे में फना होने का न हो जाये,
तो ऐसे इश्क़ की रवायतों को निभाने का मतलब क्या है।

Thursday, 17 October 2019

सोचता हूँ की आज कुछ जल्दी शाम हो जाये...........😍😍😍

सोचता हूँ की आज कुछ जल्दी शाम हो जाये...........😍😍😍

सोचता हूँ की आज कुछ जल्दी शाम हो जाये,
और उस आसमाँ के चाँद को मेरे चाँद का दीदार हो जाये,
सोचता हूँ की आज कुछ जल्दी शाम हो जाये.....
मेरे नाम की हिना को जो तुमने अपने हांथों में जगह दी है,
इल्तिज़ा है मेरी की उस मेहंदी का रंग आज और भी गहरा हो जाये,
सिर्फ मैं दीदार कर सकूं उसका,बैठा हूँ इस इंतेज़ार में,और 
सोचता हूँ की आज कुछ जल्दी शाम हो जाये.....
ये जो आंखें तुम्हारी,और इन आँखों पर जो काजल को जो तुमने सजा रखा है,
सोचता हूँ कि इस काजल से क्यों न आज गहरी रात हो जाये,
और वो रात मेरी,तेरे पहलू में गुजर जाए, हूँ इसी जुस्तजू में, और
सोचता हूँ की आज कुछ जल्दी शाम हो जाये.....
ये जो पलके तुम्हारी इन नशीली निगाहों पर पहरा देती है,
मेरे दौड़ते वक्तल
आज फिर इन निगाहों को निगाहों से क्यों न बात करने दी जाए,
न इक शब्द हो गुंजित,सिर्फ इशारों ही इशारों में सारी बात हो जाये,
सोचता हूँ की आज कुछ जल्दी शाम हो जाये.....
वाबस्ता है हम-तुम,तुम-हम एक दूजे से,
चाहे आये मौसम ये पतझड़ के हमारे बीच या गिले शिकवे कुछ आम जो जाए,
मैं हूँ सिर्फ तुम्हारा ये एलान करता हूँ मैं,
चाहे छपवा दो अखबार में ,कल से चाहे बदनामी सारे आम हो जाये,
सोचता हूँ की आज कुछ जल्दी शाम हो जाये.....
"करवा" की ये शाम कितनी हसीन है,
नूर है तू मेरी, मेरे दिल का,मेरा दिल तेरा असीर है,
मिलकर बैठकर कुछ रूठना मानना हो जाय,
सोचता हूँ की आज कुछ जल्दी शाम हो जाये.....
सात वचन को पुनः जीवन्त कर ले आज,
और पुनर्जीवित  वो विवाह की पावन शाम हो जाए,
सांची प्रीत की रीत हम यूं ही निभाते जाए,
क्यूँ न उम्र भर का वादा आज इक दूजे से हम कर जाए,
मेरा दिल सिर्फ तेरा,सिर्फ तेरा हमेशा के लिए तलबगार हो जाये,
चांद रोशन हो आसमाँ में आज और मुझे तुझसे आज फिर प्यार हो जाये,
और इसी अदद लम्हे को जीने की चाहत में,
सोचता हूँ की आज कुछ जल्दी शाम हो जाये।

Sunday, 6 October 2019

जिन्हें जीने का सपना सजा रखा है………………..

जिन्हें जीने का सपना सजा रखा है……

जिन्हें जीने का सपना सजा रखा है………………..
कि मारी इक छलाँग इस कोशिश में की,
कि पूरा करूँ हर उस हसरत को,
जिनके अरमां बहुत है पाले,इन आँखों में,
जिन्हें जीने का सपना सजा रखा है,
हर उस कद,हद और सरहद के पार जाना है,
जिन्हें जीने का सपना सजा रखा है,
कोशिश है मेरी,हर उस मुकाम को हासिल करना है,
जिनके अरमां बहुत है पाले,इन आँखों में,
जिन्हें जीने का सपना सजा रखा है………………..
आंखों की नमी गवाह है,हर उस अरमाँ की,
जिसे पाने की जुस्तजू और जज्बा बना रखा है,
जिनके अरमां बहुत है पाले,इन आँखों में,
जिन्हें जीने का सपना सजा रखा है………………..
हर हालातों,मुश्किलातों पर पार पाना है,
है सिर्फ जीत क्या अब ये मैंने जाना है,
आंसू बन गए है मोती,जिनके संघर्ष की चमक से,
उनसे करना है जग को रौशन अब ये मैंने ठाना है,
महसूस करना है हर इक पल को,जीना है हर आने वाले कल को,
जिनके अरमां बहुत है पाले,इन आँखों में,
जिन्हें जीने का सपना सजा रखा है………………..
रोना है क्या? छोड़ो-छाडो यारों ये सब,
सिर्फ हंसना और मुस्कुराना ही फलसफा है,
इस जिंदगी का अब ये मैने जाना हैं,
रुकता नही कोई दौर हर वक़्त गुज़र जाता है,
चलायमान है ये पथ ओ राही,
न कुछ तू लेकर आया था,न कुछ तुझे लेकर जाना है,
बस जीले दिल भरकर हर उस दिन को,
जिनके अरमां बहुत है पाले,इन आँखों में,
जिन्हें जीने का सपना सजा रखा है………………..
हर खुशी जो मिली मुझे मेरे ख़ुदा की मुझ पर रहमत है,
बंदा हूँ मैं उसका,शीश मेरा सजदे में उसके झुकता है,
न मुझे कभी गुरुर रहे,न तबीयत मेरी गुस्ताख़ बने,
इस बात के लिए ए मेरे परवरदिगार,
हर पल तेरा,ये दिल मेरा,शुक्रगुज़ार रहता है,
कोशिश है मेरी,हर उस मुकाम को हासिल करना है,
और होगा मुकम्मल हर वो ख्वाब यकीन है मुझे,एतबार है मुझे,
जिनके अरमां बहुत है पाले,जिन्हें जीने का सपना सजा रखा है………………..
जिनके अरमां बहुत है पाले,जिन्हें जीने का सपना सजा रखा है……………….

Friday, 20 September 2019

"हसरतें कुछ अनकही सी"---🙂🙂🙂

"हसरतें कुछ अनकही सी"---

की हो मुमताज तुम मेरी,मैं हूँ शाहजहां तेरा,
की मैंने दिल के कोने में,एक ताजमहल बनाया है,
की आ भी जाओ अब तुम,और न मुझको तड़पाना,
की इंतेज़ार में तेरे अबतलक जिरागों को जगाया है,
की हर मूरत वो है जिंदा,जिन्हें तुमने बनाया है,
वरना रूहे ए इंसान भी,तेरे बिन पत्थर की काया है,
मैं हूँ आशिक नही कहता,पर तुम अरदास हो मेरी,
खुदा ने सुनकर दुआ मेरी ,मुझे तुझसे मिलाया है,
वो सुरमा तेरी आँखों का,मेरी आँखों में बसता है,
की दिल के हर इक हिस्से में, हर पल तुझको पाया है,
शरीक़ हो तुम हर हिस्से में, और हर हिस्सा तेरा सरमाया है
ग़ज़ल हो मेरे ख्वाबों की,तू मेरी हसरतों का साया है,


Tuesday, 10 September 2019

"भाभी -रिश्तों अपनों का अपनों से"

"भाभी -रिश्तों अपनों का अपनों से"
जब आपके कदम पड़े थे चौखट पर पहली बार
तब मैंने देखा आपको पहली बार,
लगा मानो कोई अपना आ गया समेटे दामन में,
बड़ों के लिए आदर,और छोटों के लिये स्नेह और प्यार,
मैं तो था सबसे छोटा परिवार में,
अबोध अपनी समझ और उम्र में,
था अनजान की देवर-भाभी का रिश्ता क्या होता है?
इस जग में,
पर तुमने इस छोटे प्यारे देवर पर खूब स्नेह लुटाया,
तेरे ममता के आंचल से ममता प्रेम बहुत है पाया,
परिवार का तुम मान हो,सम्मान हो,
और कुटुंब का अभिमान हो,
आदर्श हो हर उस मूर्ति का और,
वत्सल रूप चरितार्थ हो,
मैं हूँ तेरा देवर पुराना, न भूल से भी रूठना,
जो हो भूल से भी भूल मुझसे,प्यार से मुझे डाटना,
न बदला है ना बदलेगा,
न टूटा है और न टूटेगा,
रिश्ता हमारे बीच का अखण्ड शाश्वत सत्य है यह,
उस स्नेह और अपनेपन की डोर का,
यूं ही बना रहेगा सदा ये पावन,
मेरे जीवन की अंतिम स्वांस तक,
ये है वचन ,मन और कर्म से ,
तेरे इस नटखट देवर का।