Wednesday, 31 May 2017

"आखिर क्यों नहीं???"
                                   

आज 31 मई 2017 को विश्व तम्बाखू निषेध दिवस मनाया गया। जगह जगह कार्यक्रम भी आयोजित हुए होंगे,रैली या मार्च भी शायद आयोजित हुए होंगे । पर क्या वास्तविक रूप में हम इस बात को लेकर गंभीर हैं कि हमारे समाज में तम्बाखू को बाकई पूरी तरह से बंद हो जाना चाहिए?अगर आप इस लेख को पढ़ते समय अपना सिर हाँ में हिला रहे हैं तो क्यों अब तक ये बंद नही हुआ? क्या आप और मैं इतने कमज़ोर हैं कि एक छोटा सा प्रयास नही कर पा रहे,इस गंदगी को अपने आस-पास से खत्म कर सकें । अब आप शायद दूसरों को या सरकार को इसका जिम्मेदार ठहराएंगे। और शायद आप सही भी हो सकते हैं,क्योंकि घर के बाहर अगर सड़क पर अगर कचरा हो तो शायद ये एक बार सरकार और नगर निगम की जिम्मेदारी हो सकती है कि उसे साफ करवाया जाए क्योंकि आप टैक्स देते हैं । पर यदि गन्दगी आपके घर के अंदर हो तो उसे साफ करने की जिम्मेदारी किसकी होगी ,मतलब तम्बाखू उत्पाद जैसे सिगरेट, गुटखा आदि का सेवन करने वाले कोई बाहरी दुनिया के लोग नहीं है, ध्यान से आंखे खोलकर देखिये वो आपके व हमारे घर के ही लोग है ,शायद आपका बेटा, किसी का भाई, पति,पिता,या कोई भी हो सकता है। और अगर ये सच है तो इसका बात का आप विरोध क्यों नही करते क्यों हम मूक दर्शक बनकर इस बात को नज़रअंदाज़ करते रहते हैं । और इस बात को और बढ़ावा देते हैं और इस गलती के लिए सरकार और सिस्टम को कुसूरवार ठहराते रहते हैं ।क्यों कोई माँ अपने बच्चे को तंबाखू पदार्थों का सेवन करने से नही रोकती ,क्यों कोई पत्नी अपने पति को इस बात पर नही टोकती,क्यों कोई पिता अपने  बच्चों के सामने सिगरेट या गुटखा खाने से परहेज़ नहीं करता।
सोचने की जरूरत है, और बस एक सकारात्मक कदम  बढ़ाने की जरुरत है ।आपका एक छोटा सा प्रयास आपके घर के सदस्यों का जीवन काल भी बढ़ाएगा और समाज से इस गंदी आदत को शायद जड़मूल से खत्म कर दे।
"तो क्या शुरुआत आज से न की जाए-जरुर करें"
                                "संयोग डायरी" 

Thursday, 2 February 2017

बजट श्रीमतीजी का ......................


 बजट श्रीमतीजी का....................

आज बजट पेश होने वाला था,हमारी श्रीमती जी ने चेह्कते हुए बोला कि आज बजट पेश होने वाला है तो क्यों न हम दोनों साथ में बैठकर देखेंहमने कहा हमें क्या ख़ास मिलेगा? तो उन्होंने बड़ी ही चतुरता से कहा,कि बजट की घोषणाओं में जो भी राहत मिलेगी तो फ़ायदा आपको भी मिलेगा और अगर किसी चीज़ की कीमतें कम ज्यादा हुई तो हमारी तरफ से भी आपको फ़ायदा मिलेगा तो हम भी उनकी रस भरी बातों में आकर वहां उनके साथ टीवी के सामने बैठ गए।
ज्यों ही सरकार ने बजट पेश किया,वैसे ही श्रीमती जी ने घर में अपना बजट पेश कर दिया,जैसे जैसे वित्तमंत्री घोषणाएं करते जा रहे थे,श्रीमती जी की भी घोषणाएं होने लगी,बजट में सौन्दर्य उत्पादों को महंगा किया गया तो श्रीमती जी ने पहला अध्यादेश पारित कर दिया कि घर में सजने सवरने की चीज़ें कम की जाएँ इन पर भी खर्च कम किया जायेगा,हमें ये सुनकर बेहद्द ख़ुशी हुई आशा की एक किरण दिखाई दी कि शायद ये बजट  हमारे लिए ख़ुशी लेकर आयेगा,पर ज्यादा देर ये ख़ुशी रह नहीं पाई क्योंकि सबसे पहले श्रीमती जी ने हमारी ही ऐसी-तैसी कर दी।  आदेश आया की अब से शेव करने के लिए शेविंग क्रीम का उपयोग नहीं किया जायेगा,सिर्फ पानी का उपयोग कर शेव किया जाये,क्योंकि पुरषों की स्किन को क्रीम की ज़रूरत कम होती है तो उपयोग भी कम ही होना चाहिए इसीलिए अलग से पुरषों वाली क्रीम और बॉडी लोशन पर खर्च बंद किया,इन सब पर पहला और सिर्फ अधिकार हम महिलाओं  का हैये सब सुनकर हमने कहा अब बस भी कीजिये आगे का बजट भाषण भी तो देखने दीजिये
          सरकार के वित्त मंत्री ने आगे का बजट पड़ना शुरू किया अगली बेहद अच्छी घोषणा थी कि जिसे सुनकर हम बहुत खुश हुए , घोषणा थी की अब टैक्स देने की वार्षिक आय की सीमा बड़ा दी गयी है और टैक्स की दरों में भी कमी आ गयी है तो फिर क्या था,श्रीमती जी ने फटाफट कैलकुलेटर चलाया और नए रियायती दरों के अनुसार हमारी सैलरी पर लगने वाला टैक्स कैलकुलेट कर दिया और एक कुशल चार्टेड अकाउंटेंट की तरह हमें इस बात से अवगत कराया की अब से हमारी टैक्स बचत लगभग 5000 से 7000 रूपये तक की होगी हमें ये देखकर ख़ुशी हुई की हमारी श्रीमतीजी को हमारा कितना ख़याल है पर ये हमारी भूल थी अभी एटम बम गिरना बाकी था,जो अब हमारे ऊपर गिरा और श्रीमती जी जो की हमारे घर की गृह मंत्री/वित्तमंत्री थी की ओर से नया अध्यादेश लागू करने की घोषणा की गयी जो सिर्फ हम पर लागू होना था जिसमें साफ़ समझाया कम धमकाया गया की इन बचत के पैसों की ओर मेरी गलती से भी नज़र न जाये ,ये पैसा उनके मायके फण्ड में जायेगा क्योंकि हमारे ससुराल में किसी दूर के रिश्तेदार के यहाँ शादी है तो हमारी श्रीमतीजी जी को बनारसी साड़ी पहननी है और नेकलेस भी चाहिए ताकि शादी में वो सभी को दिखाकर जला सकें ,हमें तो बस एक ही आशा की किरण दिखाई दी थी,की शायद बजट की इस रियायत भरी घोषणा के साथ हमें हमारे गृह मंत्री से कुछ राहत मिलेगी पर उन्होंने सारी आशाओं पर पानी फेर दियाइतना सब होने के बाद हमसे आगे का बजट नहीं सुना जायेगा,दिल में घबराहट होने लगी की अगर पहली दो घोषणाएं इतना भूचाल ला सकती है,तो पता नहीं आगे की घोषणाएं क्या रंग दिखाएंगी।
ज्यों ही हम रणभूमि छोड़ कर जाने लगे तो श्रीमती जी ने चेतावनी के रूप में पुछा कहाँ जा रहे हैं आप ?अभी तो बजट भाषण बाकि है तो हमनें कहा की थोड़ी देर में आते है तो उन्होंने कहा आगे  पेट्रोल की कीमतों का एलान होने वाला है देंखें इस बार कीमतें बढती हैं या घटती है,खैर फ़र्क तो कुछ नहीं पड़ेगा लोग गाड़ी चलाना तो छोड़ेंगे नहीं,वैसे आप को भी अपनी सेहत का ध्यान रखना चाहिए हम कुछ आश्चर्य चकित हुए की अचानक ये ह्रदय परिवर्तन कैसा,पर ये हमारी भूल थी जो कुछ उतावला होकर हम ये समझ बैठे आगे उन्होंने कहा की गाड़ी का उपयोग कम कीजिये और कल से सब्जी लेने आप पैदल ही जायेंगे ये आखिरी वार था जो हमारे गृहमंत्री ने हम पर किया था और बजट में मिलने वाली सारी रहत को अपने अध्यादेशों के भोझ टेल दबा कर कुचल दिया था
वाह रे बजट!!!

Tuesday, 31 January 2017

“अनरय-समाज के काएदे”

अनरय-समाज के काएदे
होली का त्यौहार नज़दीक था,सभी जगह होली की तैयारियां ज़ोरों पर थी,6 साल का विशु अपने घर पर बहुत उत्साह के साथ होली की तैयारियों में जुटा था,क्योंकि उसकी परीक्षा भी पूरी हो चुके थे,वो अपनी माँ के पास गया जो की इस समय रसोई में होली के त्यौहार पर आने वाले मेहमानों के लिए पकवान बना रही थी,उनके पास जाकर अपने लिए नयी पिचकारी और रंगों की फरमाइश करने लगा पर माँ ने ये कहकर उसका जोश ठंडा कर दिया की इस साल वो होली नहीं खेल सकता,इस साल की होली “अनरय” की होली है,क्योंकि कहीं किसी दूर की रिश्तेदारी में किन्ही बुजुर्ग का जिन्हें उन्होंने कभी देखा भी नहीं था 10 महीने पहले स्वर्गवास हो गया था,जब विशु नहीं समझा तो उन्होंने कहा की लोग क्या कहेंगे और समाज के नियम के अनुसार ये दुःख की होली है तो हम नहीं मना सकते,ये सुनकर उदास विशु ने अपने निश्छल मन से अपनी माँ की ओर  देखकर पुछा कि यदि ये दुःख की होली है तो आप रसोई में ये पकवान क्यों बना रही है?अपने बेटे के मुंह से ऐसा सवाल सुनकर वो भी निरुत्तर हो गयी ...........

Saturday, 28 January 2017

SECOND INNING HOMEहम है तो क्या गम है ................
उम्र के एक पड़ाव पर जब बुढ़ापा दस्तक देता है,तो शरीर की ताक़त के साथ-साथ,कुछ रिश्ते जैसे कभी-कभी अपनी संतान भी जिनके लिए उम्र भर सोचा,जिनके लिए सारा जीवन जिया और हर काम किया वो भी दूर होने लगते है,कभी हमारे हर दिन की शुरुवात जिनसे और अंत भी जिनके लिए हुआ करता था जिनके लिए हमने समय दिया उनके पास आज हमारे लिए ही समय नहीं बचता और वो हमें ज़िन्दगी में “चुका हुआ” जानकर किसी कोने में छोड़कर आगे बढने लगते हैं
ऐसे में दो रास्ते बचते हैं या “तो मनमार कर और दुखी होकर बाकी की ज़िन्दगी रो-रोकर बिताये” या दूसरा रास्ता “अपनी हिम्मत को बटोर कर दुबारा खड़े हो और ऊपर वाले की दी हुई इस खूबसूरत नेमत “ज़िन्दगी” के बचे हुए पलों को बड़ी खूबसूरती के साथ जियें और जो अरमान और सपने अपने बच्चों की जरूरतों को पूरा करने में आप नहीं जी पाए उन सभी को जी भर कर जियें और पूरा करें”
इस बात की जीती जागती मिसाल हमें मिली “आनंदाश्रम वृद्धाश्रम” में हमारे द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम “एक दिन दादा-दादी के साथ” में मिली हालाँकि इसे “वृद्धाश्रम” कहना मुझे सही नहीं लगता इसका नाम “सेकंड इनिंग हाउस” होना चाहिए क्योंकि यहाँ के सभी सदस्य भले ही अपनी उम्र से बुजुर्ग हो लेकिन अपनी सोच और ऊर्जा से किसी भी युवा से कम नहीं हैइसका जीवंत उदाहरण यहाँ की एक महिला सदस्य है,जिनका आधा चेहरा लकवे से पीड़ित है,उसके बाद भी हमारे साथ बेहद्द ख़ुशी और जोश के साथ भजन गा रही थी यहाँ सभी सदस्य एक दुसरे के साथ एक परिवार की तरह रहते हैं अगर कभी कोई एक गिरता हैं तो उसे सँभालने के लिए दूसरा खड़ा हो जाता है,ये वही सहारा है जो कभी इन लोगों ने अपने परिवार और बच्चों से चाहा था और उन्हें नहीं मिला पर अब ये लोग इन सब बातों से कहीं आगे निकल चुके हैं,और कमर कस कर जोश के साथ तैयार है अपनी जीवन की “सेकंड इनिंग” को जीने के लिए जिसमे अब ये आज़ाद है,अपनी इक्षाओं को पूरा करने के लिए,आज़ाद है फिर अपने सपनों के कैनवास पर नए रंग भरने के लिए

“प्रभव वेलफेयर सोसाइटी” का हर सदस्य यही प्रार्थना करता है,“ आनंदाश्रम” का हर सदस्य अपने घर वापस लौट जाये लेकिन सिर्फ तभी जब उनके अपने बच्चे उन्हें आदर और सम्मान के साथ अपने साथ रखें हम सभी ने कभी ईश्वर को नहीं देखा सभी लोग उसे ढूंढने जाते है देवालयों में जाते हैं,पर ये भूल जाते हैं की ऊपर वाले ने हमें हमारे माता पिता के रूप में साक्षात् ईश्वर हमारे घर में दिए है,ये बहुत अमूल्य संपत्ति हैं इन्हें बड़े सम्मान और प्यार से सहेज कर रखिये ये दोबारा नहीं मिलने वाले

Friday, 27 January 2017

सपनों का आसमान.............

सपनों का आसमान..........
तारीख़ 14 जुलाई 2016 दिन गुरुवार समय सुबह के कुछ 8:00 बज रहे थे,हम सभी लोग निश्चित समय पर तय जगह पर पहुँच गए,मौका था “प्रभव वेलफेयर सोसाइटी सागर” के एक और कार्यक्रम का जिसका नाम हमने “नन्हे कलाकार” रखा था,घड़ी की सुई की टिक-टिक की आवाज़ के साथ हम सभी सदस्यों के हाँथ भी तेजी से चल रहे थे तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए,और थोडा डर भी लग रहा था कि ये नन्हे बच्चे प्रतियोगिता के शीर्षक को समझ पाएंगे की नहीं,और कुछ बना भी पायेंगें की नहीं, इन आशंकाओं के बीच ठीक 8 बजकर 10 मिनिट पर सभी बच्चे “सरस्वती शिशु मंदिर पथरिया जाट” गाँव में स्कूल के कमरे में इकट्ठा होना शुरू गए, वो सभी इस आयोजन को लेकर बहुत उत्साहित दिख रहे थे,नन्ही आँखें आत्मविश्वास से भरी हुई थी,जिन्हें देखकर हम सभी को थोडा सुकून आयानियत समय 8 बजकर 15 मिनिट पर कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमें हमने उन्हें कलर बॉक्स और ड्राइंग शीट दी और तुरंत ही उन लोगों ने अपने सपनों के कैनवास पर जो भी आकृतियाँ बनायीं थी,उन्हें वहां रंगों से साकार करना शुरू कर दिया चूँकि कार्यक्रम का उद्देश्य इन नन्हे बच्चों को प्रकृति के करीब लाना था इसीलिए इन सभी को “जीवन में पेड़ों का महत्व” पर अपनी रचना बनाने को कहा गया था.

जैसे जैसे समय आगे बढता गया वैसे वैसे हमारी सारी आशंकाएं छु मंतर हो गयी हर नन्हें बच्चे ने इतनी सफाई और दिल से अपनी रचना के आकर को साकार किया कि सही मायने में उन्हें “नन्हे बच्चे” कहना गलत लग रह था वो सच में “नन्हे कलाकार” लग रहे थे सभी ने अपनी अपनी रचनाओं से “जीवन में प्रकृति का महत्व” बताया अंत में जब फैसले की घड़ी आई तो हम सब उन सभी की रचनाओं को देखकर हतप्रभ रह गए,क्योंकि सब एक से बढकर एक थी,कोई किसी से कम नहीं था फिर भी हमें पुरुस्कार तो कुछ ही रचनाओ को देना था सो बेहद मुश्किल से फैसला ले पाए फिर भी सभी “नन्हे कलाकारों” को हमने प्रोत्साहन के तौर पर कुछ उपहार भी दिए ये पल अपने आप में कुछ अलग ही अनुभव दे रहे थे जब हम सभी वहां से बिदा ले रहे थे तो मन में एक अलग ही उत्साह था आज की सुबह ये “नन्हे कलाकार” हम सभी के लिए एक प्रेरणा दूत बन कर आये जिन्होंने सिर्फ एक घंटे के छोटे से समय अंतराल में हमें बहुत कुछ सिखा दिया था. इन पलों को हम सभी ने अपने अपने कैमरों से तस्वीर के रूप में सहेज कर हमेशा के लिए अपने पास रख लिया

Sunday, 31 July 2016

सवाल खुद से और सब से.............

सवाल खुद से और सब से.............

कल मेरी मुलाकात एक सज्जन से हुई वैसे तो वो मेरे ही सहकर्मी हैं,लेकिन डिपार्टमेंट अलग अलग होने के कारण कभी उनसे ज्यादा बातचीत नहीं होती थी,सामान्य नमस्कार से आगे कुछ नहीं.पर पिछले कुछ समय से किसी प्रोजेक्ट पर उनके साथ काम करना हुआ तो कल जब लगातार काम करते-करते पॉवर कट हुआ,तो हम दोनों के पास एक दुसरे से बात करने के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था,क्योंकि वो मुझसे उम्र में काफी सीनियर है,सो मैंने बातचीत शुरू की मैंने उनसे पुछा आपकी शादी को तो काफी साल हो गए होंगे,तो कहने लगे हाँ सर बहुत साल हो गए,जब मैंने उनसे उनके परिवार के बारे में पुछा तो कहने लगे कि उनकी एक पत्नी और दो बच्चे हैं क्योंकि वो सज्जन एक पड़े लिखे इंजीनियर है और बड़ी ही शान से बताने लगे उनकी पत्नी भी एक इंजिनियर है,फिर मैंने बड़ी उत्सुकता भरे भाव से पुछा कि भाभी जी किस प्रोफेशन में हैं,उन्होंने खोकले पुरुषवादी सोच के तहत कहा कि अरे नहीं सर जी (वो मुझे सर कह कर बुलाते है क्योंकि उम्र में भले ही वो मुझ से बड़े हो पर मैं उनसे पोस्ट वाइज सीनियर हूँ),तो मुझसे कहने लगे की अरे नहीं सर जी वो कहाँ जॉब वोब करेगी उसके बसका नहीं है वो बस घर पर अपना काम करती है,मैंने कहा मैं कुछ समझा नहीं क्योंकि मुझे लगा की शायद वो फ्री लांसर की तरह घर पर से कोई ऑनलाइन काम करती होंगी. पर कहने लगे अरे नहीं वो घर के काम जैसे साफ़ साफाई,खाना बनाना बगैरह, मेरा और बच्चों का ख़याल रखती हैं बस यही तो उसका काम है और फ़र्ज़ भी. इस पर मैंने कहा की पर वो तो एक इंजीनियर हैं न तो इस पर आगे उन्होंने कहा कि वैसे भी औरतें घर के बहार कोई काम करें वो मुझे पसंद नहीं.ये सब सुनकर मुझे बहुत  बुरा लगा. पर क्योंकि मेरे उनसे कोई घनिष्ठ व्यवहार नहीं थे सो चुप रहा,पर इस कुछ देर की बातचीत ने मेरा उनके प्रति नजरिया बदल दिया,ये सोचकर दांग रह गया की इतना पड़ा लिखा आदमी एक ऐसी सोच के साथ अपने परिवार में अपनी पड़ी लिखी पत्नी के अरमानों को कुचल रहा है,यह बात कहाँ तक सही है की उनकी पत्नी नौकरी या कोई भी काम जो उन्हें समाज में अपना नाम और मुकाम बनाने में मदद कर सकता है करे या ना करे इस बात का फैसला क्या सिर्फ उन सज्जन को ही लेने का हक़ हैं की उनकी पत्नी  क्या करे क्या ना करे ,क्या ये उनकी पत्नी का हक़ नहीं की वो भी इस बात का फैसला ले सकें.

हम अपने घरों में ही जाने अनजाने में हमारी माँ,बहिन या पत्नी की काबिलियत को उनके गृह कार्य में दक्षता के आधार पर ही तौलते हैं और इस बात को पूरी तरह से नज़र अंदाज़ करते हैं की वो क्या चाहती हैं उन्हें आसमान में उड़ने का मौका देने का काम करिए,ना की उनके पर कतरने का और उनकी सुरक्षा के नाम पर या घर की मान मर्यादा के नाम पर ,परंपरा के नाम पर उनके सपनो को ख़त्म करने का.

सवाल खुद से और सब से.............

सवाल खुद से और सब से.............

कल मेरी मुलाकात एक सज्जन से हुई वैसे तो वो मेरे ही सहकर्मी हैं,लेकिन डिपार्टमेंट अलग अलग होने के कारण कभी उनसे ज्यादा बातचीत नहीं होती थी,सामान्य नमस्कार से आगे कुछ नहीं.पर पिछले कुछ समय से किसी प्रोजेक्ट पर उनके साथ काम करना हुआ तो कल जब लगातार काम करते-करते पॉवर कट हुआ,तो हम दोनों के पास एक दुसरे से बात करने के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था,क्योंकि वो मुझसे उम्र में काफी सीनियर है,सो मैंने बातचीत शुरू की मैंने उनसे पुछा आपकी शादी को तो काफी साल हो गए होंगे,तो कहने लगे हाँ सर बहुत साल हो गए,जब मैंने उनसे उनके परिवार के बारे में पुछा तो कहने लगे कि उनकी एक पत्नी और दो बच्चे हैं क्योंकि वो सज्जन एक पड़े लिखे इंजीनियर है और बड़ी ही शान से बताने लगे उनकी पत्नी भी एक इंजिनियर है,फिर मैंने बड़ी उत्सुकता भरे भाव से पुछा कि भाभी जी किस प्रोफेशन में हैं,उन्होंने खोकले पुरुषवादी सोच के तहत कहा कि अरे नहीं सर जी (वो मुझे सर कह कर बुलाते है क्योंकि उम्र में भले ही वो मुझ से बड़े हो पर मैं उनसे पोस्ट वाइज सीनियर हूँ),तो मुझसे कहने लगे की अरे नहीं सर जी वो कहाँ जॉब वोब करेगी उसके बसका नहीं है वो बस घर पर अपना काम करती है,मैंने कहा मैं कुछ समझा नहीं क्योंकि मुझे लगा की शायद वो फ्री लांसर की तरह घर पर से कोई ऑनलाइन काम करती होंगी. पर कहने लगे अरे नहीं वो घर के काम जैसे साफ़ साफाई,खाना बनाना बगैरह, मेरा और बच्चों का ख़याल रखती हैं बस यही तो उसका काम है और फ़र्ज़ भी. इस पर मैंने कहा की पर वो तो एक इंजीनियर हैं न तो इस पर आगे उन्होंने कहा कि वैसे भी औरतें घर के बहार कोई काम करें वो मुझे पसंद नहीं.ये सब सुनकर मुझे बहुत  बुरा लगा. पर क्योंकि मेरे उनसे कोई घनिष्ठ व्यवहार नहीं थे सो चुप रहा,पर इस कुछ देर की बातचीत ने मेरा उनके प्रति नजरिया बदल दिया,ये सोचकर दांग रह गया की इतना पड़ा लिखा आदमी एक ऐसी सोच के साथ अपने परिवार में अपनी पड़ी लिखी पत्नी के अरमानों को कुचल रहा है,यह बात कहाँ तक सही है की उनकी पत्नी नौकरी या कोई भी काम जो उन्हें समाज में अपना नाम और मुकाम बनाने में मदद कर सकता है करे या ना करे इस बात का फैसला क्या सिर्फ उन सज्जन को ही लेने का हक़ हैं की उनकी पत्नी  क्या करे क्या ना करे ,क्या ये उनकी पत्नी का हक़ नहीं की वो भी इस बात का फैसला ले सकें.

हम अपने घरों में ही जाने अनजाने में हमारी माँ,बहिन या पत्नी की काबिलियत को उनके गृह कार्य में दक्षता के आधार पर ही तौलते हैं और इस बात को पूरी तरह से नज़र अंदाज़ करते हैं की वो क्या चाहती हैं उन्हें आसमान में उड़ने का मौका देने का काम करिए,ना की उनके पर कतरने का और उनकी सुरक्षा के नाम पर या घर की मान मर्यादा के नाम पर ,परंपरा के नाम पर उनके सपनो को ख़त्म करने का.